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मुक्तक माला

मैं जन की बात करता रहा
वो धन की बात समझती रही .
मै गन की बात करता रहा
वो रण की बात समझती रही .

अब ओर उसे कैसे समझाता मै.....

मै "मन की बात" करता रहा
वो फन की बात समझती रही .

 किया नहीं किया,तुझे पाने के वास्ते।
क्या नही किया, तुझे मिल जाने के वास्ते।
रात कि निन्द खोई दिन का चैन खोया..
एक बार गले लगाने के वास्ते।

इस जमीन से, उस आसमान तक !
उस आसमान से,उस आसमान तक।
जव देखता हूँ, जिधर देखता हूँ !
तेरा चेहरा दिखता है,उस आसमान तक।

ना हम मंदिर भुले है।
ना हम मस्जिद भुले है।
कुछ भुले है अगर तो,
काम का तहजिव भूले है।

हमने भी कश्म खा ली थी।
बेशक दिल्ली मे शर्दी भाडी थी।
शर्दी को शर्दी माना तभी,
जब केजरी ने मफलर डाली थी।

मेरे तन मे है तू।
मेरे मन मे है तू।
तेरा क्या नाम दू,
तूझमे हूँ मै मुझमे है तू।

या खुदा तू ही बता क्या कसूर मेरा था!
मैने उसे पाना चाहा था जो सिर्फ मेरा था।
मेरा था या मेरे समझ का फेरा था।
वो जो भी था जैसा भी था मेरा था।

(c) कुमार मनोज
9871784593

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