नमस्कार दोस्तो आज समाज के लोगो के सौच मे भारी अंतर आ गया है जो अच्छे समाज के हित मे नही है
पहले हम सोचते थे...
साई इतना दिजिये जामय कुटुम समाय।
मै भी भुखा ना रहु साधु ना भुखा जाय।
आज कल सौचते है..
साई इतना दे दिजिये मेरे सात पुरुष ना खापाय।
मै भुखा रहुँ ना बेश्क जग भुखा सो जाय।
इस सोच को हमारे समाज को बदले चाहिये।
पहले हम सोचते थे...
साई इतना दिजिये जामय कुटुम समाय।
मै भी भुखा ना रहु साधु ना भुखा जाय।
आज कल सौचते है..
साई इतना दे दिजिये मेरे सात पुरुष ना खापाय।
मै भुखा रहुँ ना बेश्क जग भुखा सो जाय।
इस सोच को हमारे समाज को बदले चाहिये।
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