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04 कविता :- मेरा ख्वाब

कल भी मेरा ख्वाब था,
विवश, अकेली, असहाय,
चक्रब्यूह मे कैद,
विपती से जुझता हुआ, मजबूर मेरा ख्वाब।

कल उसके समक्ष थी,
अपनो की
खडी की गई दिवारे,
अपनो का पैदा किया,  असुरक्षा का ब्युह।

जिसके शिकंजे मे कशकर
मेरा ख्वाब मारा गया
और नाम हुआ था,
आवारगी का ।
वो कल का मेरा ख्वाब था।

और आज?
आज भी मेरा ख्वाब है,
अंतर कही नही है
बदला है मात्र चेहरा,
मात्र उदेश्य ।

स्थिति वही है वही पुरानी
मजबूर मेरा ख्वाब
अभिमन्यु के समान ही, निरंतर लड. रहा है
और घिरता जा रहा है!

एक ओर व्यूह के दायरे मे
मेरा ख्वाब मरा नही था,
वो जिवित है ।
आज हर रोज मर रहा है
दोबारा जीने के लिए।.

कल भी मेरा ख्वाब था।
आज भी मेरा ख्वाब है ।
कल भी मेरा ख्वाब रहेगा।

(C) कुमार मनोज
09871784593

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