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09 कविता:- कवि और किसान।

मै एक किसान, कविता उगाता हुँ,
अपने मन के खेत मे।
अभी अभी कविता का
बीज बोया हैइस निर्जल रेत मे ।।

मन की यह भूमि,
उपजाऊ होकर भी बंजर सी है ।
कविता का बौर नुकीला है, और
वाक्य संरचना खंजर सी है ।।

कभी मन मे पड़ता है प्रेम का सूखा
तो कभी बाढ़ आ जाती है ।
कभी अनमनेपन की दीमक
कविता की फसल को बर्बाद कर जाती है ।।

तभी तो, सार्थक कविता का
अकाल पड गया है ।
न जाने कितने किसानो का,
अनाज सड़ गया है ।।

कविता को, मंडी मे भी
उचित भाव नही मिल रहा है ।
अच्छी फसल के बावज़ूद
किसानो का चेहरा  नही खिल रहा है ।।

आज हर कवि विवश और लाचार
किसान सा हो गया है ।
कवि सम्मेलनो के जुगाड़ू समीकरणों से
आज हर कवि  परेशान सा हो गया है ।।

मनोज ठाकुर
09871784593
07503059322

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