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22 कविता : विजय गीत गता रहूंगा

विजय गीत गाता रहँगा ।
यह तिरंगा लहराता रहँगा।
निरंतर संर्घश का मार्ग चुना हुँ।
चलता रहा हुँ, चलता रहुँगा।

कल तक अनुदानो पर जीते थे।
लाचारी का जहर पीते थे 
आत्म निर्भर हो गये है हम,
सीखा हमने स्वम उगाना।
मौका नही देते हम किसी को, यू हिन्द का मखोल उडाना।
हम नही भागते भौतिक सुख के पिछे।
सब सुख है हमारे अधात्मिक सुख के निचे।
पश्चिमी सभ्यता मे कहाँ असल है।
वो स्वंम र्दुभावनाओ कि नकल है।
किया अमेरिका चीन जापान, सब स्वाभिमान के साथ पुकारेगे।
अब कभी हमे आँख नही दिखलायेगे।
दिया अगर पाक को सह,
इन सब पर तिरंगा फहरायेगे।

(C) कुमार मनोज
09871784593

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