Skip to main content

24 कविता : धर्म आज व्यापार हो गया।

धर्म आज व्यापार हो गया।
कृपा आज कारौवार हो गया।
आस्थाऔ का मंदिर,
बाजार हो गया।

संतो का संतो से,तकरार हो गया।
प्रतिदिन का स्वाँग रचाना व्यवहार हो गया।
साई पर सन्तो का,पलतवार हो गया।
गेरुआ रंग,शर्मसार हो गया।
आस्थाऔ का मंदिर,बाजार हो गया।
धर्म..

सादगी अब शृंगार हो गया।
बाबा अब कलाकार हो गया।
साधु के भेष मे डाकु, मालामाळ हो गया।
भक्तौ के भावनाऔ से,खिलवार हो गया ।
आस्थाऔ का मंदिर,बाजार हो गया।
धर्भ...

स्त्रियो का मंदिर जाना,दूशवार हो गया।
भक्तौ का भरोसा,तारतार हो गया।.
जोगी के भेष मे भोगी,नेहाल हो गया।
गुरु के हाथो शिश्याओ का,दूराचार हो गया।
आस्थाऔ का मंदिर,बाजार हो गया।
धर्म...

आज कितनेआशा, निर्मल,राम,तैयार हो गया।
फिर भी मंदिर मे आरती है,चमत्कार हो गया।
लोजी"मनोज" कि कविता,तैयार हो गया।
आस्थाऔ का मंदिर,बाजार हो गया।
धर्म आज व्यापार हो गया।
कृपा आज कारोवार हो गया।

(c) कुमार मनोज
09871784593

Comments

Popular posts from this blog

केजीवाल महराज की जय।

*माननीय श्री अरविंद केजरीवाल भाई को तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने की बहुत बहुत शुभकामनाएं !  सर आपसे देश को बहुत आशायें है देश के कोने कोने मे आज भी करोड़ों गरीब लोग हैं जिनके पास खाने को अन्न नही पहनने को कपडे नही रहने को मकान नही इसलिए श्रीमान केजरीवाल जी ये देश चाहता है आप देश के प्रधानमंत्री बने और पूरे देश को यही सौगात दें जो आपने दिल्ली की जनता को दिया है आखिर जनता दिल्ली की हो या देश के किसी भी कोने की आखिर है तो वो इसी देश का नागरिक ही! !  इसलिए श्रीमान केजरीवाल जी आप अपनी पार्टी का विस्तार करिये ओर फिर देश की जनता आपको यहां से बाहर भी निकालकर प्रधानमंत्री बनाना चाहती है ताकी आप पूरे देश के नागरिको को बिजली,  पानी ,  शिक्षा,  स्वास्थ्य,  वाईफाई,  सफर,  बैक लोन फ्री मे दे सको जिससे जनता को इन सबका बिल न देना पडे ।।* *श्रीमान केजरीवाल जी आपसे विनम्र निवेदन है कि आप जीएसटी की दर को भी कम कर दें या राज्य सरकार के टैक्स को भी समाप्त कर दे जिससे व्यापारी वर्ग और आम उपभोक्ताओं को फायदा मिल जाय और आम जनता की जेबे कटने से बच जाय! !*   *श्रीम...

होली मेसन 2019

आलू का समोसा खाकर लालू गए जेल। पप्पू का सोना बनाने का फर्रमुला हो गया फैल।। जोगीरा सारा रारा,____'_

मुक्तक माला

मैं जन की बात करता रहा वो धन की बात समझती रही . मै गन की बात करता रहा वो रण की बात समझती रही . अब ओर उसे कैसे समझाता मै..... मै "मन की बात" करता रहा वो फन की बात समझती रही .  किया नहीं किया,तुझे पाने के वास्ते। क्या नही किया, तुझे मिल जाने के वास्ते। रात कि निन्द खोई दिन का चैन खोया.. एक बार गले लगाने के वास्ते। इस जमीन से, उस आसमान तक ! उस आसमान से,उस आसमान तक। जव देखता हूँ, जिधर देखता हूँ ! तेरा चेहरा दिखता है,उस आसमान तक। ना हम मंदिर भुले है। ना हम मस्जिद भुले है। कुछ भुले है अगर तो, काम का तहजिव भूले है। हमने भी कश्म खा ली थी। बेशक दिल्ली मे शर्दी भाडी थी। शर्दी को शर्दी माना तभी, जब केजरी ने मफलर डाली थी। मेरे तन मे है तू। मेरे मन मे है तू। तेरा क्या नाम दू, तूझमे हूँ मै मुझमे है तू। या खुदा तू ही बता क्या कसूर मेरा था! मैने उसे पाना चाहा था जो सिर्फ मेरा था। मेरा था या मेरे समझ का फेरा था। वो जो भी था जैसा भी था मेरा था। (c) कुमार मनोज 9871784593