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Showing posts from 2019

होली मेसन 2019

आलू का समोसा खाकर लालू गए जेल। पप्पू का सोना बनाने का फर्रमुला हो गया फैल।। जोगीरा सारा रारा,____'_

शेर

इश्क, मोहोबत, प्यार, वफा, सब मालूम पर जाते हैं!             जब सर के बचे खुचे बाल  जाते हैं।।

मुक्तक माला

मैं जन की बात करता रहा वो धन की बात समझती रही . मै गन की बात करता रहा वो रण की बात समझती रही . अब ओर उसे कैसे समझाता मै..... मै "मन की बात" करता रहा वो फन की बात समझती रही .  किया नहीं किया,तुझे पाने के वास्ते। क्या नही किया, तुझे मिल जाने के वास्ते। रात कि निन्द खोई दिन का चैन खोया.. एक बार गले लगाने के वास्ते। इस जमीन से, उस आसमान तक ! उस आसमान से,उस आसमान तक। जव देखता हूँ, जिधर देखता हूँ ! तेरा चेहरा दिखता है,उस आसमान तक। ना हम मंदिर भुले है। ना हम मस्जिद भुले है। कुछ भुले है अगर तो, काम का तहजिव भूले है। हमने भी कश्म खा ली थी। बेशक दिल्ली मे शर्दी भाडी थी। शर्दी को शर्दी माना तभी, जब केजरी ने मफलर डाली थी। मेरे तन मे है तू। मेरे मन मे है तू। तेरा क्या नाम दू, तूझमे हूँ मै मुझमे है तू। या खुदा तू ही बता क्या कसूर मेरा था! मैने उसे पाना चाहा था जो सिर्फ मेरा था। मेरा था या मेरे समझ का फेरा था। वो जो भी था जैसा भी था मेरा था। (c) कुमार मनोज 9871784593

26 कविता : आज का अर्जुन

अर्जुन ने कहा श्री कृष्ण से.. हे प्रभु आईये। जडा कलयुग मे भी रासलीला दिखाईये। श्री कृष्ण पाकर अर्जुन का संदेश, देखकर आधुनिक परिवेश। आगया उनमे आबेश, दिया अर्जुन को उपदेश।. ये क्या अर्जुन कलयुग मे, कैसी मैरी लीला कि तैयारी है? गोपिऔ के खुले बदन, गुवालाऔ पर कपडा भाडी है। सौच स्नान चारदिवारी मै, प्रेम आलिगंन खुले मे करने की तैयारी है? शादी ब्याह से परहेज करे यहाँ, यहाँ डेटिग सैटिग की मारामारी है। घौर आधुनिकता ये नर नारी हमे दिखाते है। नर से नर, नारी से नारी कैसा संबंध बनाते है। दाम्यपत जीवन मे कोई किसी का साथ नही निभाते है। पत्नि अपनी पति बदले, पति दुसरी पटाते है। डेटिग सैतिग की उपज ये, एबोसन करवाते है।. अपने कुल का कुलभुसन, अनाथालय से लाते है। कौन किसका माँ बाप, भाई बहन, कौन किसके सगे? पशु पक्षी जैसी जीवन शैली इसे ये आधुनिकता कहे। कहे "ठाकुरजी" अर्जुन से " क्यो मुझे ऐसी रासलीला करने बुलाया है" मेरी प्रेम की परिभाषा का तुमने गलत अर्थ लगाया है। धिकार है धिकार है धिकार है। हे मंगल च...

24 कविता : धर्म आज व्यापार हो गया।

धर्म आज व्यापार हो गया। कृपा आज कारौवार हो गया। आस्थाऔ का मंदिर, बाजार हो गया। संतो का संतो से,तकरार हो गया। प्रतिदिन का स्वाँग रचाना व्यवहार हो गया। साई पर सन्तो का,पलतवार हो गया। गेरुआ रंग,शर्मसार हो गया। आस्थाऔ का मंदिर,बाजार हो गया। धर्म.. सादगी अब शृंगार हो गया। बाबा अब कलाकार हो गया। साधु के भेष मे डाकु, मालामाळ हो गया। भक्तौ के भावनाऔ से,खिलवार हो गया । आस्थाऔ का मंदिर,बाजार हो गया। धर्भ... स्त्रियो का मंदिर जाना,दूशवार हो गया। भक्तौ का भरोसा,तारतार हो गया।. जोगी के भेष मे भोगी,नेहाल हो गया। गुरु के हाथो शिश्याओ का,दूराचार हो गया। आस्थाऔ का मंदिर,बाजार हो गया। धर्म... आज कितनेआशा, निर्मल,राम,तैयार हो गया। फिर भी मंदिर मे आरती है,चमत्कार हो गया। लोजी"मनोज" कि कविता,तैयार हो गया। आस्थाऔ का मंदिर,बाजार हो गया। धर्म आज व्यापार हो गया। कृपा आज कारोवार हो गया। (c) कुमार मनोज 09871784593

23 कविता :- रेलगाड़ी का सफ़र।

जब पायल छनक जाती थी। मन घायल कर जाती थी। तब उनकी नजरो से, मेरी नजर मिल जाती थी। लडकपन का एक, सफर था हमारा। सामने आकर बैठा, एक चेहरा प्यारा। हमारे बीच, रति भर की दूरी थी। अगर मै साँस भी लु,तो वो मैरी थी। कभी धरकने तेज होती, कभी मंद। मन मे हो रही थी, हुदहुदी सी जंग। तेज हवा उनके मुखरे से, जुल्फो को हिलाती थी। जुल्फे कभी न्यनो तो कभी गालो को सहलाती थी। कभी लालीदार होठो को छु जाती थी। कभी मेरे साँसो से लहराती थी। जुल्फो को बाँध रखी थी, खुबशुरत डोर से। तुम रिस्ते चलाने जाते. तो हाँ कह देते,मेरी ओर से। मुखरे की बात,कैसे बताऊँ?. दिल करता था,उसकी रोशनी मे,जीवन बिताउँ.।। चली गई अपनो के,हाथो मे डाले हाथ। खत्म हुआ,कुछ घन्टो का साथ। (C) कुमार मनोज  09871784593

22 कविता : विजय गीत गता रहूंगा

विजय गीत गाता रहँगा । यह तिरंगा लहराता रहँगा। निरंतर संर्घश का मार्ग चुना हुँ। चलता रहा हुँ, चलता रहुँगा। कल तक अनुदानो पर जीते थे। लाचारी का जहर पीते थे  आत्म निर्भर हो गये है हम, सीखा हमने स्वम उगाना। मौका नही देते हम किसी को, यू हिन्द का मखोल उडाना। हम नही भागते भौतिक सुख के पिछे। सब सुख है हमारे अधात्मिक सुख के निचे। पश्चिमी सभ्यता मे कहाँ असल है। वो स्वंम र्दुभावनाओ कि नकल है। किया अमेरिका चीन जापान, सब स्वाभिमान के साथ पुकारेगे। अब कभी हमे आँख नही दिखलायेगे। दिया अगर पाक को सह, इन सब पर तिरंगा फहरायेगे। (C) कुमार मनोज 09871784593

21 कविता:- वो मुझसे दूर होती गई

जीवन तू संघर्ष है,   नित नए रंग दिखलाता है।     नित्य यहाँ कुछ खोए कोई,       कोई कुछ पाता है। तेरा है आचरण अनूप,   पल पल बदले तेरे रुप।     इक पल मे तू बने समन्दर,       दूजे पल छोटा सा कूप। कुछ को खाली कर देता तू.   और कुछोँ को भर जाता है।     जीवन तू संघर्ष है,       नित नए रंग दिखलाता है। जो जीवन मे हार मान ले,   वो बोलो क्या मानव है।     जो संघर्ष ना कर पाए,       समय लगे उसे दानव है। व्यर्थ गवाता है जो समय,   समय उसको खा जाता है।     जीवन तू संघर्ष है,       नित नए रंग दिखलाता है। कौन याद करेगा उसको,   जो ना कभी लड सका।     जीवन की संघर्ष  राह पर,       जो ना कभी अड सका। गुमनाम होकर वो,   इतिहास के पन्नो मे खो जाता है।     जीवन तू संधर्ष है,       नित नए रंग दिखलाता है। (C) कुमार मनोज 09871784593

20 कविता:- जीवन तू संघर्ष हैं

जीवन तू संघर्ष है,   नित नए रंग दिखलाता है।     नित्य यहाँ कुछ खोए कोई,       कोई कुछ पाता है। तेरा है आचरण अनूप,   पल पल बदले तेरे रुप।     इक पल मे तू बने समन्दर,       दूजे पल छोटा सा कूप। कुछ को खाली कर देता तू.   और कुछोँ को भर जाता है।     जीवन तू संघर्ष है,       नित नए रंग दिखलाता है। जो जीवन मे हार मान ले,   वो बोलो क्या मानव है।     जो संघर्ष ना कर पाए,       समय लगे उसे दानव है। व्यर्थ गवाता है जो समय,   समय उसको खा जाता है।     जीवन तू संघर्ष है,       नित नए रंग दिखलाता है। कौन याद करेगा उसको,   जो ना कभी लड सका।     जीवन की संघर्ष  राह पर,       जो ना कभी अड सका। गुमनाम होकर वो,   इतिहास के पन्नो मे खो जाता है।     जीवन तू संधर्ष है,       नित नए रंग दिखलाता है। (C) कुमार मनोज 09871784593

19 कविता : कभी कश्मीर मांगता है।

कभी कश्मीर माँगता है,कभी पंजाब माँकता है। वही हिमाकत,वही नादानियाँ,बार बार करता है। बार बार अपनी औकात,भूल जाता है! और मुँह की खाने,आ जाता है। तेरे जैसे कुत्ते,सीमा पर भौका करते है। जव जव जागे क्रोध हमारा,बैमौत मरा वो करते है। तुझको कैसे दे देँ ,कश्मीर कोई खैरात नही है। तू कश्मीर कोअपना कर ले,ये तेरीऔकात नही है। केवल एक प्रदेश नही ये,हिन्दूस्तान का ताज है ये। हम जिसपर,मर मिट सकते है !हर हिन्दूस्तानी का, नाज है ये ! हमको मत समझ सरल दरिया !हम तो तुफानी मौजे है। मत समझ कि,हम गलफत मे है,मुस्तैदहिन्द की फौजे है। सौचता था एक प्पु,अपने ही गले पडा है। अब जाना की,सरहद पार,प्पुओ से भडा है। कभी कश्मीर माँगता है,कभी पंजाब माँगता है। वही हिमाकत,वही नादानियाँ,बार बार करता है। (C) कुमार मनोज 09871784593

18 कविता :- कोसी किनारे मेरा गौव

एकाढ़ कोशी किनारे मोरा गाँव, कभी धुप कभी छाँव। एक तरफ बस्ती, और खेत! एक तरफ,रेत ही रेत।!   कोशी तटबंध किनारे हनुमान थान। मध्य कृष्णा-घर भेरब स्थान।! एक तरफ माँ ज्वालामुखी-घर। एक तरफ धर्मराज गहबर। गाम के मध्य मुख्य डगर। सबका घर अगल बगल।। भिन्नता का रंग समाया। सब ने इसे सजाया। गाम छोटा ही सही पर अपना एक शान हो। सहरसा बिहार मे ही नही भारत मे पहचान हो।। कोई कश्मिर को जन्नत जाने। हम तो एकाढ को स्वर्ग माने। (c)कुमार मनोज 09871784593

17 कविता:- जडा पीली है।

जडा पीली है। 1 जो सखी रंगो से सदा बचती थी। जो ओरो से  जूदा दिखती थी।। आज उसने भी खेली होली है। आज उसकी भी चूँदर पीली है।। 2 होली मे सजती समरती दूलहनियाँ। रंगो से रंगो की बनती पहेलियाँ।। आज मायके के लिए पलके गीली है। आज उसने भी गम की घुट पीली है।। 3 जब ससूरा  सास के साथ खेले होली। बदमा के साथ वो भी मदहोश होली।। उसने देवरा की मुँह करि नीली हैं। लो अब उसकी भी बदन पीली है। 4 जब सखी जैठ ने फेकी रंग उसपर। वो खिलखिलाई सखी ........

16 कविता : भावनाओ की सरिता।।

भावनाऔ की मन मे बहती अनंत सरिता। पर तूझे शब्द नही दे पाता मै कविता।। असमंजस मे रहती ये मन सदा। वक्त भी तो मिलती है यदाकदा।। नैन से नैन मिले और इज्हारे महोब्बत हो। ये जरुरी तो नही हर भावनाऐ शब्द हो।। जिन्दगी अब तक समझ गई होगी मुझको। शब्द के भाव भावनाऔ के शब्द को। जिस वक्त ने सिखलाया मन मे घाव बनाना।  उसी वक्त सिखलाता है मनके घाव मिटाना। मै ढिढोरा नही पिटता तेर शब्द की कविता। बस मन मे रहने दो भावनाऔ की सरिता।।

15 कविता :- होली आई ।।

होली आई होली आई। अलहर यौवन पर रंग चढाने आई होली प्रिय की मिलन की आस जगाने आई होली। अपने पराये शिकवे दुर मिटाने आई होली। लाल हरा नीला पीला रंग लगाने आई होली। प्रिय के गालो गुलाल लगाके आई  होली। पिचकारी से गोली के घाव भरने आई होली। प्रिय को प्रिय से मिलाने आई होली। पक्ष , विपक्ष को साथ मिलाने  आई होली। अहम की दिवार गिराने आई होली। इंसान का इंसान से फासला मिटाने आई होली। राम जी कि अयोध्या को रंग लगाके आई होली। ठाकुर जी के मथूरा मे रास रचाके आई होली। होली आई होली आई। कुमार मनोज 9871784593

14 कविता :- बदले विचार

बदले लैला के विचार। "कोई पत्थर स ना मारे मेरे दिवाने को" ऐसा वो पहले कहती थी। मारो, और मारो, जो मेरा ना हुआ उसे और की क्यो होने दूँ। ऐसा वो अब सोचती है। कुमार मनोज 9871784593

13 कविता: साई इतना डे दीजिए।

नमस्कार दोस्तो आज समाज के लोगो के सौच मे भारी अंतर आ गया है जो अच्छे समाज के हित मे नही है पहले हम सोचते थे... साई इतना दिजिये जामय कुटुम समाय। मै भी भुखा ना रहु साधु ना भुखा जाय। आज कल सौचते है.. साई इतना दे दिजिये मेरे सात पुरुष ना खापाय। मै भुखा रहुँ ना बेश्क जग भुखा सो जाय। इस सोच को हमारे समाज को बदले चाहिये।

12 कविता: पहले और अब।।

पहले उपर वाला    किताब लेकर बैठता था         इसीलिये हिसाब   *अगले जन्म मे होता था*            पर अब वो भी    *लैपटाप* लेकर बैठता है       इसीलिए हिसाब   *इसी जन्म मे हो जाता है*        *सभंलकर कर्म करे*

11 कविता :- तुम यहां के या वहां के??

यहाँ के या वहाँ के। छोडो भी ख्याल,सारे जहाँ के । यहाँ का ही सोचो,तुम रह के यहाँ पे ।। यहाँ के लिए खाये थे तुम नमक यहाँ के, तो फिर,गुणगान  कैसे की वहाँ के ।। धोबी के, कुत्ते सी हालत तुम्हारी है, ना हो तुम यहाँ के, ना हो  तुम वहाँ के । अभी भी  संभल जाओ,प्यारे कन्हैया, नमक खाओ जहाँ के गीत गाओ वहाँ के। मनोज ठाकुर 9871784593 7503059322

10 कविता:- मन की बात।

मै जन की बात करता रहा वो धन की बात समझती रही . मै गन की बात करता रहा वो रण की बात समझती रही . अब ओर उसे कैसे समझाता मै..... मै "मन की बात" करता रहा वो फन की बात समझती रही . ✍के मनोज ठाकुर 09871784593 07503059322

09 कविता:- कवि और किसान।

मै एक किसान, कविता उगाता हुँ, अपने मन के खेत मे। अभी अभी कविता का बीज बोया हैइस निर्जल रेत मे ।। मन की यह भूमि, उपजाऊ होकर भी बंजर सी है । कविता का बौर नुकीला है, और वाक्य संरचना खंजर सी है ।। कभी मन मे पड़ता है प्रेम का सूखा तो कभी बाढ़ आ जाती है । कभी अनमनेपन की दीमक कविता की फसल को बर्बाद कर जाती है ।। तभी तो, सार्थक कविता का अकाल पड गया है । न जाने कितने किसानो का, अनाज सड़ गया है ।। कविता को, मंडी मे भी उचित भाव नही मिल रहा है । अच्छी फसल के बावज़ूद किसानो का चेहरा  नही खिल रहा है ।। आज हर कवि विवश और लाचार किसान सा हो गया है । कवि सम्मेलनो के जुगाड़ू समीकरणों से आज हर कवि  परेशान सा हो गया है ।। मनोज ठाकुर 09871784593 07503059322

08 कविता :- चाहे मंदिर में ज्योत जलाओ।

चाहे मंदिर मेँ जोत जलाओ । चाहे मस्जिद मेँ कलमा गाओ ।। चाहे गुरुद्वारे मे गुरवाणी का पाठ करो । चाहे चर्च मे प्रभू ईसा को याद करो ।। हमे कोई आपत्ति नही, ये अब तुम्हे जानना होगा । भारत मे रहना है तो वन्दे मातरम गाना होगा ।। 2 देश है तो हम हैं हम हैं तो धर्म है । देश के आगे धर्म का ओहदा बहुत कम है ।। अपनी मजहबी सोच से मुँह मोडना होगा । देश के स्वर से स्वर जोड़ना होगा ।। भारत के हर सपूत को अपना मुँह खोलना होगा । हर देशवासी को भारत माँ की जय बोलना होगा ।। 3 शहीदो ने जय हिन्द बोलकर जाने कितने कोड़े खाये थे । जय हिन्द बोलने पर अंग्रेजो ने जाने कितने सितम ढाऐ थे ।। उनके लहु के एक एक क़तरे का कर्ज़ चुकाना होगा । मजहबी कट्टरपंथी सोच को खुद से दूर भगाना होगा ।। तुम सबसे पहले एक भारतीय हो मन मस्तिष्क मे लाना होगा । राष्ट्र धर्म के पालन के लिए वंदे मातरम गाना होगा ।। 4 चाहे मंदिर की घंटी बजाओ या ना बजाओ । चाहे मस्जिद मे सर झुकाओ या ना झुकाओ ।। चाहे गुरुद्वारे के द्वार तक जाओ या ना जाओ । चाहे चर्च मे ईसा को मनाओ या ना मनाओ ।। पर अब तुम्हे अपना ये हठ धर्म छोड़ना ह...

07 कविता: मैंने पीना कब सीखा था।

मैने पीना कब सीखा था? मैने जीना कब सीखा था? एक बोतल जो टूट गयी, तो महफ़िल सारी रूठ गयी॥ ये दुनिया एक महफ़िल है और हम इसके मेहमाँ हैं, हैं कुछ साक़ी और कुछ आशिक़ उम्मीदें हैं ,कुछ अरमाँ हैं॥ आज अगर कुछ शब्द बहे, तो आखिर दिल से कौन कहे, प्यार वफ़ा कसमें और वादे अब इनकी पीड़ा कौन सहे? पीड़ा को इतिहास बता कर पीना मैने अब सीखा है। शायद लोग और कुछ कह दें पर जीना मैने अब सीखा है॥

06 कविता:- उनसे भी मुझे सीख ही मिली।

उनसे भी मुझे सीख ही मिली, ना व्यर्थ गया जीवन सारा। मै आभारी हुँ उस मन का, जिसको कभी ना हुआ गवारा। स्नेह बहुत था जिनसे. जो ना रहा हमारा। धन्य हुआ मै तुझको खोकर, जो तुने  किया किनारा।

05 कविता :- करोड़ों का सवाल

करोडो का सवाल। एक बार हम टीवी देख रहे थे जला के मोमबती। कार्यक्रम आ रहा था, कौन बनेगा करोडपति। अमीत जी सवाल पे सवाल किये जा रहे थे। होटसीट वाला हर सवाल का जवाब दिये जा रहे थे। उस दिन का कार्यक्रम हमे नही भाया। जब सात करोड का एक सवाल आया। हाँट सीट पर बैठी भी जवाब नही दे पाई। तब जनता की औपेनियन की बारी आई। सवाल करोडो का, मुश्किल, पर नेक था। ए बी सी डी मे से जवाब कोई एक था। संनाटे के बीच जनता का औपेनियन आई। पचपन प्रतिशन जनता ने ए को सही बताई। ए को जवाब के रुप मे किया गया लाँक। कमप्युटर महोदय के जाँचने पर लगा साँक। कमप्युटर से निकली एक खतरनाक साँग। बहुमत से निकला जनता का औपेनियन  राँग। मेरा कहने का मतलब समझो मेरे भाई। कभी कभी गलत हो जाते है जनता की राय। अब जनता के लिए ना कोई सवाल है। बस पाँच साल केजरिवाल ही केजरिबाल है। K Manoj Thakur 9871784592

04 कविता :- मेरा ख्वाब

कल भी मेरा ख्वाब था, विवश, अकेली, असहाय, चक्रब्यूह मे कैद, विपती से जुझता हुआ, मजबूर मेरा ख्वाब। कल उसके समक्ष थी, अपनो की खडी की गई दिवारे, अपनो का पैदा किया,  असुरक्षा का ब्युह। जिसके शिकंजे मे कशकर मेरा ख्वाब मारा गया और नाम हुआ था, आवारगी का । वो कल का मेरा ख्वाब था। और आज? आज भी मेरा ख्वाब है, अंतर कही नही है बदला है मात्र चेहरा, मात्र उदेश्य । स्थिति वही है वही पुरानी मजबूर मेरा ख्वाब अभिमन्यु के समान ही, निरंतर लड. रहा है और घिरता जा रहा है! एक ओर व्यूह के दायरे मे मेरा ख्वाब मरा नही था, वो जिवित है । आज हर रोज मर रहा है दोबारा जीने के लिए।. कल भी मेरा ख्वाब था। आज भी मेरा ख्वाब है । कल भी मेरा ख्वाब रहेगा। (C) कुमार मनोज 09871784593

03 कविता :- बचपन में मैं भी कहता था।

14.11.1994 चाचा नेहरु ना ऍसा बनो, ना वैसा बनो! बन सको तो चाचा नेहरु जैसा बनो। मोती के लाल थे वो, दोलत का नशा कभी नही चखे वो। जीवन की हर खुशीयाँ को त्याग दी। आजादी के जंग मे भाग ली। ना ऍसा बनोँ... गाँधी के दाँया हाथ बने वो, आजादी के जंग मे सदा साथ रहे वो। उनकी मेहनत रंग लाई। तब जाकर हमने आजादी पाईं। ना ऍसा बनो.. आजादी मिल गई थी हमे देश घायल था हमारा टुकडो टुकडो मे बटने लगे थे हम,.. तब चाचा ने ऐकता की भडी दम। ना ऍसा बनो.. बच्चो मे उनकी आत्मा का वास थी। कल का भविष्य होने का आभास था। हम सब के जान के प्यारे थे वो। एक इंसान जडा निराले थे वो। ना ऍसा बनोँ.. इस धरती पर ना रहे अब वो। जाने किस रुप मे आ जाये कब वो जीवन के नाव तो चलते रहेगे। चाचा के तस्वी दिल मे सदा खिलते रहेगे। ना ऍसा बनो.. (C) कुमार मनोज 9015387604

02 कविता :- अपना बिहार

देख लो माँ सीता तेरी मिथिला बनी बिहार है। देख लो शिव(उगना) विद्यापति घर बना बिहार है। बौध विहारो शब्द से बना शब्द ये बिहार है। महाबीर, बुद्द गुरुगोबिन्द सिह कि जन्म भूमि बना बिहार है। ऐतिहासिक अंगराज, मंगधराज आज का बिहार है। कभी किसी को नही सताने बाला प्राँत बिहार है! मुगलो को दो दो वार हराने बाला प्राँत बिहार है। भारत मे स्वदेशी की नीव रखनेवाला प्राँत बिहार है। गाँधीजी का पहला सत्याग्रह चलानेवाला प्राँत बिहार है। राष्टीय आंदोलन को वीर कुँवर सिह देने वाला प्राँत बिहार है। देश को प्रथम राष्टपति राजेन्दर प्रसाद देनेवाला बिहार है। आर्य भट्ट, जे पी की मात्रभुमि बना बिहार है। गोदना अहीपन लोककला वाला प्राँत बिहार है। अदभूत मधुबनी पेन्टीग रंगने वाला प्राँत बिहार है। धाधरा गंडक बागमती कमला कोशी वाला प्राँत बिहार है। सोन पुनपुन कर्मनासा बहने वाला प्राँत बिहार है। संसार को पहला लोकतंत्त बैशाली देनेबाला प्राँत बिहार है। कभी कुशासन कभी सुशासन कहलाने वाला प्राँत बिहार है। संसार को पहला विश्वविद्यालय नालंदा देनेवाला प्राँत बिहार है। फिर क्यो आज शिक्षा मे पिछडा प्र...

01 कविता :- मैंने लिखना केसे सीखा

जिसके पास मै जाता हुँ, जो भी मेरे पास आते है।. बस ये सबाल कर जाते है। जवाब माँगने लग जाते है। मै उन पुछनवालो से, नही घवराता हुँ ! खुले शब्दो मे, जवाब दे आता हुँ ! होगा आपके मन मे भी, सवाल तिखा । मैने कविता लिखना कैसे सीखा ? लडकपन मे देखी एक छवि। जिसने साधारण मनुष्यं को बनाया कवि। प्रथम सनेह मे सनते रहे। उसे देख देख कविता बनते रहे। यू ही चलता रहा जीवन। और भावनाऔ को, शब्द देता रहा कविमन। अव वो छवि तो विछड गई है। जीवन बगीया उजर गई है। पर ना उदास हुँ ना हतास हुँ, अब मै अपना स्वम प्रकाश हुँ। शब्दो का धन मेरे पास है। कोई धनी नही मुझ सरीखा अव तो आप समझ गये होँगे मैने कविता लिखना कैसे सीखा।. (C) कुमार मनोज 09871784593