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01 कविता :- मैंने लिखना केसे सीखा

जिसके पास मै जाता हुँ, जो भी मेरे पास आते है।. बस ये सबाल कर जाते है। जवाब माँगने लग जाते है। मै उन पुछनवालो से, नही घवराता हुँ ! खुले शब्दो मे, जवाब दे आता हुँ ! होगा आपके मन मे भी, सवाल तिखा । मैने कविता लिखना कैसे सीखा ? लडकपन मे देखी एक छवि। जिसने साधारण मनुष्यं को बनाया कवि। प्रथम सनेह मे सनते रहे। उसे देख देख कविता बनते रहे। यू ही चलता रहा जीवन। और भावनाऔ को, शब्द देता रहा कविमन। अव वो छवि तो विछड गई है। जीवन बगीया उजर गई है। पर ना उदास हुँ ना हतास हुँ, अब मै अपना स्वम प्रकाश हुँ। शब्दो का धन मेरे पास है। कोई धनी नही मुझ सरीखा अव तो आप समझ गये होँगे मैने कविता लिखना कैसे सीखा।. (C) कुमार मनोज 09871784593

25 कविता :- बदलाव

प्रेमिका जब पत्नी बन जाती है ! तो कैसे उसकी स्वभाव बदल जाती है। पहले पुकारती थी, हेलो हाऊ आर यू जानू। अब पुकारती है, कलमुहे कहाँ मर गया तू।  पहले फोन करके पुछती थी, जानू कल डेट पर चलोगे? अब डाँटकर कर कहती है, घर सीधे आना नही तो आज फिर पिटोगे। पहले डेट पर कहती थी,  तुम्हारे साथ कितना मजा आ रहा हैं! अब घर पर कहती है तुम्हारे साथ जिना सजा लग रहा है। पहले कहती थी, आज का मौसम कितना हसीन है। अब कहती है, मेरे भी कपडे धो दो खराब वार्शिग मशीन है। पहले मुझसे मिलने का, बहाना धुधती थी। अब मुझसे खाना पकवाने का बहाना धुधती है। पहले प्यार से कहती थी, जानू हम साथ साथ है। अब भाईयो को गिनकर कहती है, हम सात आठ है। पहले जिद कहती थी। एक बनारशी साडी मुझे दिलाओ। अव जिम्मेदारी समझ कर कहती है, आखरी दिन है बिजली का बिल भर आऔ। पहले शक करके पुछती थी औफिस मे कोन होती है तुम्हारे साथ। अब विस्वास के साथ कहती है, मैने गलती नही की थाम के तुम्हारा हाथ। (c) कुमार मनोज     09871784593

केजीवाल महराज की जय।

*माननीय श्री अरविंद केजरीवाल भाई को तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने की बहुत बहुत शुभकामनाएं !  सर आपसे देश को बहुत आशायें है देश के कोने कोने मे आज भी करोड़ों गरीब लोग हैं जिनके पास खाने को अन्न नही पहनने को कपडे नही रहने को मकान नही इसलिए श्रीमान केजरीवाल जी ये देश चाहता है आप देश के प्रधानमंत्री बने और पूरे देश को यही सौगात दें जो आपने दिल्ली की जनता को दिया है आखिर जनता दिल्ली की हो या देश के किसी भी कोने की आखिर है तो वो इसी देश का नागरिक ही! !  इसलिए श्रीमान केजरीवाल जी आप अपनी पार्टी का विस्तार करिये ओर फिर देश की जनता आपको यहां से बाहर भी निकालकर प्रधानमंत्री बनाना चाहती है ताकी आप पूरे देश के नागरिको को बिजली,  पानी ,  शिक्षा,  स्वास्थ्य,  वाईफाई,  सफर,  बैक लोन फ्री मे दे सको जिससे जनता को इन सबका बिल न देना पडे ।।* *श्रीमान केजरीवाल जी आपसे विनम्र निवेदन है कि आप जीएसटी की दर को भी कम कर दें या राज्य सरकार के टैक्स को भी समाप्त कर दे जिससे व्यापारी वर्ग और आम उपभोक्ताओं को फायदा मिल जाय और आम जनता की जेबे कटने से बच जाय! !*   *श्रीम...

दिल्ली चुनाव के बाद

Congratulations to AAP and Shri @ArvindKejriwal Ji for the victory in the Delhi Assembly Elections. Wishing them the very best in fulfilling the aspirations of the people of Delhi.

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😂😂😂😂😝😝😝 स्कूल में बडी दुविधा होती रही थी जब : 1.बायोलॉजी के टीचर ने पढाया : सेल मतलब 'शरीर की कोशिकाएँ'। 2.फिजिक्स के टीचर ने पढाया : सेल मतलब 'बैटरी', 3.इकोनॉमिक्स के टीचर ने पढाया: सेल मतलब 'बिक्री', 4.हिस्ट्री के टीचर ने पढाया : सेल मतलब 'जेल', 5.अंग्रेजी के टीचर ने पढाया: सेल मतलब 'मोबाइल', टीचरों के पढ़ाई पर भरोसा करना छोड़ दी भाई साब, यह सोचकर कि जिस स्कूल में पांच शिक्षक एकमत नहीं है उस स्कूल में पढ़ कर क्या होगा ? और  *सच्चा ज्ञान मिला जब पत्नी ने बताया सेल मतलब 'डिस्काउंट' !!* 😆😝

होली मेसन 2019

आलू का समोसा खाकर लालू गए जेल। पप्पू का सोना बनाने का फर्रमुला हो गया फैल।। जोगीरा सारा रारा,____'_

शेर

इश्क, मोहोबत, प्यार, वफा, सब मालूम पर जाते हैं!             जब सर के बचे खुचे बाल  जाते हैं।।

मुक्तक माला

मैं जन की बात करता रहा वो धन की बात समझती रही . मै गन की बात करता रहा वो रण की बात समझती रही . अब ओर उसे कैसे समझाता मै..... मै "मन की बात" करता रहा वो फन की बात समझती रही .  किया नहीं किया,तुझे पाने के वास्ते। क्या नही किया, तुझे मिल जाने के वास्ते। रात कि निन्द खोई दिन का चैन खोया.. एक बार गले लगाने के वास्ते। इस जमीन से, उस आसमान तक ! उस आसमान से,उस आसमान तक। जव देखता हूँ, जिधर देखता हूँ ! तेरा चेहरा दिखता है,उस आसमान तक। ना हम मंदिर भुले है। ना हम मस्जिद भुले है। कुछ भुले है अगर तो, काम का तहजिव भूले है। हमने भी कश्म खा ली थी। बेशक दिल्ली मे शर्दी भाडी थी। शर्दी को शर्दी माना तभी, जब केजरी ने मफलर डाली थी। मेरे तन मे है तू। मेरे मन मे है तू। तेरा क्या नाम दू, तूझमे हूँ मै मुझमे है तू। या खुदा तू ही बता क्या कसूर मेरा था! मैने उसे पाना चाहा था जो सिर्फ मेरा था। मेरा था या मेरे समझ का फेरा था। वो जो भी था जैसा भी था मेरा था। (c) कुमार मनोज 9871784593

26 कविता : आज का अर्जुन

अर्जुन ने कहा श्री कृष्ण से.. हे प्रभु आईये। जडा कलयुग मे भी रासलीला दिखाईये। श्री कृष्ण पाकर अर्जुन का संदेश, देखकर आधुनिक परिवेश। आगया उनमे आबेश, दिया अर्जुन को उपदेश।. ये क्या अर्जुन कलयुग मे, कैसी मैरी लीला कि तैयारी है? गोपिऔ के खुले बदन, गुवालाऔ पर कपडा भाडी है। सौच स्नान चारदिवारी मै, प्रेम आलिगंन खुले मे करने की तैयारी है? शादी ब्याह से परहेज करे यहाँ, यहाँ डेटिग सैटिग की मारामारी है। घौर आधुनिकता ये नर नारी हमे दिखाते है। नर से नर, नारी से नारी कैसा संबंध बनाते है। दाम्यपत जीवन मे कोई किसी का साथ नही निभाते है। पत्नि अपनी पति बदले, पति दुसरी पटाते है। डेटिग सैतिग की उपज ये, एबोसन करवाते है।. अपने कुल का कुलभुसन, अनाथालय से लाते है। कौन किसका माँ बाप, भाई बहन, कौन किसके सगे? पशु पक्षी जैसी जीवन शैली इसे ये आधुनिकता कहे। कहे "ठाकुरजी" अर्जुन से " क्यो मुझे ऐसी रासलीला करने बुलाया है" मेरी प्रेम की परिभाषा का तुमने गलत अर्थ लगाया है। धिकार है धिकार है धिकार है। हे मंगल च...

24 कविता : धर्म आज व्यापार हो गया।

धर्म आज व्यापार हो गया। कृपा आज कारौवार हो गया। आस्थाऔ का मंदिर, बाजार हो गया। संतो का संतो से,तकरार हो गया। प्रतिदिन का स्वाँग रचाना व्यवहार हो गया। साई पर सन्तो का,पलतवार हो गया। गेरुआ रंग,शर्मसार हो गया। आस्थाऔ का मंदिर,बाजार हो गया। धर्म.. सादगी अब शृंगार हो गया। बाबा अब कलाकार हो गया। साधु के भेष मे डाकु, मालामाळ हो गया। भक्तौ के भावनाऔ से,खिलवार हो गया । आस्थाऔ का मंदिर,बाजार हो गया। धर्भ... स्त्रियो का मंदिर जाना,दूशवार हो गया। भक्तौ का भरोसा,तारतार हो गया।. जोगी के भेष मे भोगी,नेहाल हो गया। गुरु के हाथो शिश्याओ का,दूराचार हो गया। आस्थाऔ का मंदिर,बाजार हो गया। धर्म... आज कितनेआशा, निर्मल,राम,तैयार हो गया। फिर भी मंदिर मे आरती है,चमत्कार हो गया। लोजी"मनोज" कि कविता,तैयार हो गया। आस्थाऔ का मंदिर,बाजार हो गया। धर्म आज व्यापार हो गया। कृपा आज कारोवार हो गया। (c) कुमार मनोज 09871784593

23 कविता :- रेलगाड़ी का सफ़र।

जब पायल छनक जाती थी। मन घायल कर जाती थी। तब उनकी नजरो से, मेरी नजर मिल जाती थी। लडकपन का एक, सफर था हमारा। सामने आकर बैठा, एक चेहरा प्यारा। हमारे बीच, रति भर की दूरी थी। अगर मै साँस भी लु,तो वो मैरी थी। कभी धरकने तेज होती, कभी मंद। मन मे हो रही थी, हुदहुदी सी जंग। तेज हवा उनके मुखरे से, जुल्फो को हिलाती थी। जुल्फे कभी न्यनो तो कभी गालो को सहलाती थी। कभी लालीदार होठो को छु जाती थी। कभी मेरे साँसो से लहराती थी। जुल्फो को बाँध रखी थी, खुबशुरत डोर से। तुम रिस्ते चलाने जाते. तो हाँ कह देते,मेरी ओर से। मुखरे की बात,कैसे बताऊँ?. दिल करता था,उसकी रोशनी मे,जीवन बिताउँ.।। चली गई अपनो के,हाथो मे डाले हाथ। खत्म हुआ,कुछ घन्टो का साथ। (C) कुमार मनोज  09871784593

22 कविता : विजय गीत गता रहूंगा

विजय गीत गाता रहँगा । यह तिरंगा लहराता रहँगा। निरंतर संर्घश का मार्ग चुना हुँ। चलता रहा हुँ, चलता रहुँगा। कल तक अनुदानो पर जीते थे। लाचारी का जहर पीते थे  आत्म निर्भर हो गये है हम, सीखा हमने स्वम उगाना। मौका नही देते हम किसी को, यू हिन्द का मखोल उडाना। हम नही भागते भौतिक सुख के पिछे। सब सुख है हमारे अधात्मिक सुख के निचे। पश्चिमी सभ्यता मे कहाँ असल है। वो स्वंम र्दुभावनाओ कि नकल है। किया अमेरिका चीन जापान, सब स्वाभिमान के साथ पुकारेगे। अब कभी हमे आँख नही दिखलायेगे। दिया अगर पाक को सह, इन सब पर तिरंगा फहरायेगे। (C) कुमार मनोज 09871784593

21 कविता:- वो मुझसे दूर होती गई

जीवन तू संघर्ष है,   नित नए रंग दिखलाता है।     नित्य यहाँ कुछ खोए कोई,       कोई कुछ पाता है। तेरा है आचरण अनूप,   पल पल बदले तेरे रुप।     इक पल मे तू बने समन्दर,       दूजे पल छोटा सा कूप। कुछ को खाली कर देता तू.   और कुछोँ को भर जाता है।     जीवन तू संघर्ष है,       नित नए रंग दिखलाता है। जो जीवन मे हार मान ले,   वो बोलो क्या मानव है।     जो संघर्ष ना कर पाए,       समय लगे उसे दानव है। व्यर्थ गवाता है जो समय,   समय उसको खा जाता है।     जीवन तू संघर्ष है,       नित नए रंग दिखलाता है। कौन याद करेगा उसको,   जो ना कभी लड सका।     जीवन की संघर्ष  राह पर,       जो ना कभी अड सका। गुमनाम होकर वो,   इतिहास के पन्नो मे खो जाता है।     जीवन तू संधर्ष है,       नित नए रंग दिखलाता है। (C) कुमार मनोज 09871784593

20 कविता:- जीवन तू संघर्ष हैं

जीवन तू संघर्ष है,   नित नए रंग दिखलाता है।     नित्य यहाँ कुछ खोए कोई,       कोई कुछ पाता है। तेरा है आचरण अनूप,   पल पल बदले तेरे रुप।     इक पल मे तू बने समन्दर,       दूजे पल छोटा सा कूप। कुछ को खाली कर देता तू.   और कुछोँ को भर जाता है।     जीवन तू संघर्ष है,       नित नए रंग दिखलाता है। जो जीवन मे हार मान ले,   वो बोलो क्या मानव है।     जो संघर्ष ना कर पाए,       समय लगे उसे दानव है। व्यर्थ गवाता है जो समय,   समय उसको खा जाता है।     जीवन तू संघर्ष है,       नित नए रंग दिखलाता है। कौन याद करेगा उसको,   जो ना कभी लड सका।     जीवन की संघर्ष  राह पर,       जो ना कभी अड सका। गुमनाम होकर वो,   इतिहास के पन्नो मे खो जाता है।     जीवन तू संधर्ष है,       नित नए रंग दिखलाता है। (C) कुमार मनोज 09871784593

19 कविता : कभी कश्मीर मांगता है।

कभी कश्मीर माँगता है,कभी पंजाब माँकता है। वही हिमाकत,वही नादानियाँ,बार बार करता है। बार बार अपनी औकात,भूल जाता है! और मुँह की खाने,आ जाता है। तेरे जैसे कुत्ते,सीमा पर भौका करते है। जव जव जागे क्रोध हमारा,बैमौत मरा वो करते है। तुझको कैसे दे देँ ,कश्मीर कोई खैरात नही है। तू कश्मीर कोअपना कर ले,ये तेरीऔकात नही है। केवल एक प्रदेश नही ये,हिन्दूस्तान का ताज है ये। हम जिसपर,मर मिट सकते है !हर हिन्दूस्तानी का, नाज है ये ! हमको मत समझ सरल दरिया !हम तो तुफानी मौजे है। मत समझ कि,हम गलफत मे है,मुस्तैदहिन्द की फौजे है। सौचता था एक प्पु,अपने ही गले पडा है। अब जाना की,सरहद पार,प्पुओ से भडा है। कभी कश्मीर माँगता है,कभी पंजाब माँगता है। वही हिमाकत,वही नादानियाँ,बार बार करता है। (C) कुमार मनोज 09871784593

18 कविता :- कोसी किनारे मेरा गौव

एकाढ़ कोशी किनारे मोरा गाँव, कभी धुप कभी छाँव। एक तरफ बस्ती, और खेत! एक तरफ,रेत ही रेत।!   कोशी तटबंध किनारे हनुमान थान। मध्य कृष्णा-घर भेरब स्थान।! एक तरफ माँ ज्वालामुखी-घर। एक तरफ धर्मराज गहबर। गाम के मध्य मुख्य डगर। सबका घर अगल बगल।। भिन्नता का रंग समाया। सब ने इसे सजाया। गाम छोटा ही सही पर अपना एक शान हो। सहरसा बिहार मे ही नही भारत मे पहचान हो।। कोई कश्मिर को जन्नत जाने। हम तो एकाढ को स्वर्ग माने। (c)कुमार मनोज 09871784593

17 कविता:- जडा पीली है।

जडा पीली है। 1 जो सखी रंगो से सदा बचती थी। जो ओरो से  जूदा दिखती थी।। आज उसने भी खेली होली है। आज उसकी भी चूँदर पीली है।। 2 होली मे सजती समरती दूलहनियाँ। रंगो से रंगो की बनती पहेलियाँ।। आज मायके के लिए पलके गीली है। आज उसने भी गम की घुट पीली है।। 3 जब ससूरा  सास के साथ खेले होली। बदमा के साथ वो भी मदहोश होली।। उसने देवरा की मुँह करि नीली हैं। लो अब उसकी भी बदन पीली है। 4 जब सखी जैठ ने फेकी रंग उसपर। वो खिलखिलाई सखी ........

16 कविता : भावनाओ की सरिता।।

भावनाऔ की मन मे बहती अनंत सरिता। पर तूझे शब्द नही दे पाता मै कविता।। असमंजस मे रहती ये मन सदा। वक्त भी तो मिलती है यदाकदा।। नैन से नैन मिले और इज्हारे महोब्बत हो। ये जरुरी तो नही हर भावनाऐ शब्द हो।। जिन्दगी अब तक समझ गई होगी मुझको। शब्द के भाव भावनाऔ के शब्द को। जिस वक्त ने सिखलाया मन मे घाव बनाना।  उसी वक्त सिखलाता है मनके घाव मिटाना। मै ढिढोरा नही पिटता तेर शब्द की कविता। बस मन मे रहने दो भावनाऔ की सरिता।।

15 कविता :- होली आई ।।

होली आई होली आई। अलहर यौवन पर रंग चढाने आई होली प्रिय की मिलन की आस जगाने आई होली। अपने पराये शिकवे दुर मिटाने आई होली। लाल हरा नीला पीला रंग लगाने आई होली। प्रिय के गालो गुलाल लगाके आई  होली। पिचकारी से गोली के घाव भरने आई होली। प्रिय को प्रिय से मिलाने आई होली। पक्ष , विपक्ष को साथ मिलाने  आई होली। अहम की दिवार गिराने आई होली। इंसान का इंसान से फासला मिटाने आई होली। राम जी कि अयोध्या को रंग लगाके आई होली। ठाकुर जी के मथूरा मे रास रचाके आई होली। होली आई होली आई। कुमार मनोज 9871784593